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मंगलवार, 19 जून 2007

लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं


लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं ।
इसीलिये बिन मौसम बादल छायें हैं ॥

तिमिर बहुत गहरा है लेकिन,
जीवन भी उतना ही दुर्गम ।
रात्रि प्रहर कटते जाते हैं,
बोझिल पलकें गिनती क्षण-क्षण ॥

आंखों मे सपने कुछ-कुछ अलसायें हैं ।
लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं ।
इसीलिये बिन मौसम बादल छायें हैं ॥

पतझर की रुतु, कैसी ये रितु,
क्या बयार क्या पावस रुन-झुन ।
कोपल, किसलय, कोकिल किलकिल,
कल की बातें, कल के ये दिन ॥

कुछ बेमौसम फूल यहां मुसकायें हैं ।
लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं ।
इसीलिये बिन मौसम बादल छायें हैं ॥

जीवन कठिन दुखों की गागर,
शंशयमय पनघट की हलचल ।
जीवन डोर चलेगी जबतक,
कठिनाई पनपेंगी पल-पल ॥

खुशियं के ये अश्रु सहस भर आयें हैं ।
लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं ।
इसीलिये बिन मौसम बादल छायें हैं ॥

प्रेम-रहित नीरस जीवन यह,
किस पर मै न्योछावर करता ।
आस अभी तक लगी जहां पर,
ऊष्ण, शुष्क मरुस्थल मिलता ॥

मधुर मदिर के जाम कहीं छलकायें हैं ।
लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं ।
इसीलिये बिन मौसम बादल छायें हैं ॥

~ अशोक सिंह  
    न्यू यॉर्क, 6/19/07 

2 टिप्‍पणियां:

उन्मुक्त ने कहा…

अच्छी कवितायें हैं।

gyaneshwaari singh ने कहा…

bahut pyari rachna hai apki

lagta hai gakar hi likhi hai apne