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बुधवार, 19 अगस्त 2009

बात गौर से विचारिये

बात से ही बात बने बात को संवारिये
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

बात आयी गयी ठहरी या बवाल बन गयी
बात जब चली तो तीर से कमां निकल गयी
बात बात मे ही कभी बात भी है बन गयी
बात जब नहीं बने तो बात को सम्हालिये ।
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

बात से ही तू तू मैं मैं की जबान, बोलती
दुश्मनी की दास्तानें बात से रुख मोड़तीं
बात जब बिगड़ने लगे,मेरी बात मान कर
ठहरिये और ठिठकिये माहौल आजमायिये ।
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

बात मे है बहुत गुन बात अगर तोलिये
सोच समझ और विचार कर के अगर बोलिये
बात से ही मित्र बनें, प्यार औ दुलार मिले
बात चीत कीजिये और दिलों को सजायिये ।
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

~ अशोक सिंह

1 टिप्पणी:

Nirmla Kapila ने कहा…

सुन्दर कविता के लिये आभार्