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रविवार, 22 मार्च 2009

एक गीत और कहो प्रेम का.....|


एक गीत और कहो प्रेम का, बसंत का

सांझ की बयार में, बौरों की खुमारी
सुरमई लाली, उड़ते खगों की कतारें
थके हुये पुष्पों की बिखरी सुगंध
अलसायी आंखों की जगती उमंग

पास आओ तान छेड़ो प्रीत के प्रसंग का
एक गीत और कहो प्रेम का, बसंत का

कोयल की कूक सी मीठी एक तान
छुपी छुपी, चंचल पर मादक मुस्कान
केसरिया रंग मिले सांझ के सुरूर
तितलियों से छुई-मुई मन के मयूर

प्यार मे सराबोर सांसों की त्रिष्न का
एक गीत और कहो प्रेम का, बसंत का

~ अशोक सिंह, न्यू यॉर्क  
    Mar 22, 2009

4 टिप्‍पणियां:

Sarvesh ने कहा…

Ek geet kah uthaa aaj dil basant ka.
Kyoki patra aaya hai pardesi kant ka.
Purvai naachti hai ban karke Menka,
dekho dil machal utha vairagi sant ka.
KAISI HAI DADA.

Ashok Singh ने कहा…

Bhai Sarvesh Ji,
aapne to isko anjaam tak pahuncha diya. Bahut sundar.

architect ने कहा…

तुम्हारा उपनाम " किसलय " कहा ग़ुम हो गया ?

देश दीपक " मानू "

Ashok Singh ने कहा…

maanu,
Tumko abhi tak yaad hai? Kislai me dheere dheere jaan wapas aa rahi hai.