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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

मान भी जाओ, जाने भी दो !

मान भी जाओ, जाने भी दो !

कब जाने फ़िर ये वक्त लौट कर आयेगा,
कब जाने फिर मनुहार कौन करवायेगा,
पल बीत न जाये इसका ही है डर मुझको,
कल क्या जाने दिन कौन अजूबा लायेगा !

मन जो आता, आने भी दो !
पर, मान भी जाओ, जाने भी दो !

दिन आते जाते, लाते यादों की झांकी,
तुम रहे कभी या मै ही भटका एकाकी,
अब बदली से है चांद निकलने को आया
कह दो मन की, कुछ रह जाये न बाकी !

मन चंचल है, भरमाने भी दो !
यूं, मान भी जाओ, जाने भी दो !

इनकी उनकी बातें सुनने मे है क्या रस,
निर्लिप्त भाव से लेती है दुनिया सब रस,
जो खोया पाया, हार जीत वो अपनी थी,
न्योछावर हो, अपना भी लो तुम मुझको बस !

गीत प्रणय का, गाने भी दो !
और, मान भी जाओ, जाने भी दो !

तुमने सदैव मुझसे मांगी छोटी खुशियां,
दे न सका चाही मैने जो सुख लणियां,
पर आज समय का उग्र चक्र झकझोर रहा,
जुड़ जाने दो हम दोनो की सतरंगी कड़ियां !

मीत मिले, मन तन मिल जाने भी दो !
अब, मान भी जाओ, जाने भी दो !

1 टिप्पणी:

अशोक बजाज ने कहा…

गजब की प्रस्तुति .