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सोमवार, 3 नवंबर 2014

मुक्तक - जब हवा संवेदनाओं संग

जब हवा संवेदनाओं संग हमें आगोश ले ले
तैरते आँखें खुली रख गगन-तक-अट्टालिकायेँ
नहीं सीखा ठोकरों में कभी भी रखना ज़माना
पर यहाँ तक आ गए हैं, प्रेम के प्रतिमान ले।

~ अशोक सिंह
   Nov. 2014, New York

गीत - इसलिए ही, मैं नशे में हूँ।




इसलिए ही,
मैं नशे में हूँ।

जब जगत में सर्वपरि हो
मनुज के प्रतिकूल रेले
ट रहा हो प्रेम हर दिन
बढ़ रहे सतही झमेले
मन स्वयं पर कर रहा हो
विवश, बारंबार अंकुश  
विमुख कब हो सकूँ इनसे
जब इसी संसार में हूँ ।
इसलिए ही,
मैं नशे में हूँ।

प्रेम की भी डगर पर चल
दुखों की ही खेप झेली
कौन वो इंसान जिसको
बूझूँ, है ऐसी पहेली
मित्र, अग्रज, अनुज या रब
सभी की पहचान ले ली
स्वजन की माया घिरा
पर स्वयं पर ही भार मैं हूं,
इसलिए ही,
मैं नशे में हूँ।

मोड लूँ कर्तव्य से मुख
हुआ संभव नहीं अब तक
हर कसम गाँडीव की जैसे
दिलायी सखे ने रख
जगत के कुरुक्षेत्र में अब
विजय की अभिलाषा नहीं है
पार्थ बन कर जीऊँ क्यूँ कर
कृष्ण का कोई न मैं हूँ,
इसलिए ही,
मैं नशे में हूँ।

~ अशोक सिंह
  अक्टूबर 2014, न्यू यॉर्क  

गीत - मन मीत बनो, तो चैन आए




मन मीत बनो, तो चैन आए

कुछ दर्द बढ़ा कुछ पीर बढ़ी
मन में धुंधली तस्वीर गढ़ी
कुछ दर्द के बेल और बूटों से
दिल नें दुखती तस्वीर मढ़ी
ये सच्चे दर्द या झूठे हैं
पर मन को लगे अनूठे हैं
कोई झूठ तसल्ली दे जाये
मन को कोई ढाढ़स दे जाये
मन में रहते, तो चुभते हैं
जाने अंजाने उगते हैं
कोई सीख सिखाओ, धीर धरो
इस भटके पर भी करम करो  
मन को भी कुछ आराम आये  
मन मीत बनो, तो चैन आए

आँसू की भाषा, सब मानें
कोई मन की पीर को भी जाने
जब दुखती टीसें दबी रहें
मन की आँखें डब-डबी रहें
बाहर मुस्कानों का बाना
कोई कितना ओढ़े, या माने
दुख की आँचल जब तर जाये
आँसू बह निकलें, न माने
कोई मन के भीतर झांक भी लो
क्या दुखता है कोई भाँप भी लो 
जब मन खुश तो दुनिया गद-गद
है सच ये ही, कोई जांच भी लो
कोई पीर पराई, समझ, हरो
हमसे भी थोड़ा धीर धरो
दुखियों के भी कोई काम आए
मन मीत बनो, तो चैन आए

माना सुख की ही आशा में
दो पल की प्रेम अभिलाषा में
भोला मन है, भरमाता है
भर प्रेम पींग, शरमाता है
पर ढाई आखर प्रेम भला
कब ढाई दिन से अधिक चला
दो क्षण की भावुक आशा में
जीवन भर लिया निराशा में
फिर इल्जामों से कोई भिड़ा
जीते जी मर कर कोई लड़ा
अब पीर नहीं, कोई चाह नहीं
जब आगे कोई दिखती राह नहीं
कोई उंगली थामो, गले लगो
कोई बनो रोशनी, आस जगो
भटकों को कुछ आराम आए
मन मीत बनो तो चैन आए।   

~ अशोक सिंह
  सितंबर 2014, न्यू यॉर्क 

गीत - वो हिंदी है

http://mondaymorning.nitrkl.ac.in/archives/archives/images/stories/17092012/featured.jpg



जन-मन जिव्ह्य विराजे
भारत भाषण हिंदी है

हो मन-पूर्ति जिसे पढकर
है हिंद भाषाओं की सहचर

जो जुड़ती मर्म से कोमल
वो मन का ध्यान हिंदी है।

ये बच्चन की है अलमस्ती,
ये दिनकर की है रसवन्ती
जो गहरी भी है और सादी
भाष्य विज्ञान हिंदी है।

निकलती दिल से हिन्दी है
'क्या बात है' से हिन्दी है
जगत-मन मेल करवाती
स्रोत अविराम, हिन्दी है 


~ अशोक सिंह, न्यू यॉर्क,
   नवंबर 12, 2014