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बुधवार, 19 अगस्त 2009

बात गौर से विचारिये

बात से ही बात बने बात को संवारिये
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

बात आयी गयी ठहरी या बवाल बन गयी
बात जब चली तो तीर से कमां निकल गयी
बात बात मे ही कभी बात भी है बन गयी
बात जब नहीं बने तो बात को सम्हालिये ।
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

बात से ही तू तू मैं मैं की जबान, बोलती
दुश्मनी की दास्तानें बात से रुख मोड़तीं
बात जब बिगड़ने लगे,मेरी बात मान कर
ठहरिये और ठिठकिये माहौल आजमायिये ।
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

बात मे है बहुत गुन बात अगर तोलिये
सोच समझ और विचार कर के अगर बोलिये
बात से ही मित्र बनें, प्यार औ दुलार मिले
बात चीत कीजिये और दिलों को सजायिये ।
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

~ अशोक सिंह

शनिवार, 18 जुलाई 2009

हूं मैं कौन ?



क्षण भंगुर पंजर के वाहक,
भ्रम में अब तक जीते आये ।
अविरल जीवन के सब ग्राहक,
मन से मन को हरते आये ।

सहज पवन मे डग-मग,मद्धिम
सुखमय नौका चलती रहती ।
अल्प दुखों की चुभन कदाचित
आती रहती, जाती रहती॥

बीती कितनी रुतु बसंत की
बीते कितने सुखमय साल ।
सात सुखों के इस समुद्र में
इक दिन टुटा भ्रम का जाल ।

ज्ञ्यान शिखा मे प्राण पनपते,
ही सवाल उठते कुछ मौन ।
अह वयं की उहा-पोह मे,
पूछा आखिर हूं मै कौन ?

सहज रूप से श्रंग विराजित
कर्मठता की मैं उपमा ।
सांसारिक या अहं ब्रंह हो
सब देखा, समझा अपना ।

पर कल क्या था,सोच न पाया
कौन था मैं या फिर "क्यों" हूं ।
सहज प्रतिष्ठित कर बैठा था
बरबस मैं दिखता ज्यों हूं ।

सतत रहा है "मैं" संबोधन
बाल, युवा या वृद्ध-आश्रम ।
"कौन"जुड़ा जब पृश्न कोंचता
साथ युगल का होता दुर्गम |
असमंजस मे अंतर्मन की
तह मे जा कर ली डुबकी ।
नया एक व्यक्तित्व ढूंढता
जिसमे अविरलता बसती ।

परिभाषायें बदलेंगी, ज्यों ज्यों
जीवन पथ पर कदम चलेंगे ।
आज सबल, सक्षम शरीर तो
अर्थ - सिद्धि का रंग भरेंगे ।

प्रश्न यही है, यही रहेंगे
समय न बदले इनकी रीति |
आज सरल, जो सार्थक लगती
कल जाने कैसी हो प्रीति ।

कल की जर्जर काया मे
क्या गूंजेगा उत्तर का मौन ?
उम्र का सूरज ढलते ढलते
पहचानेगा आज का "कौन" ?

~ अशोक सिंह
   न्यू यॉर्क 

रविवार, 22 मार्च 2009

एक गीत और कहो प्रेम का.....|


एक गीत और कहो प्रेम का, बसंत का

सांझ की बयार में, बौरों की खुमारी
सुरमई लाली, उड़ते खगों की कतारें
थके हुये पुष्पों की बिखरी सुगंध
अलसायी आंखों की जगती उमंग

पास आओ तान छेड़ो प्रीत के प्रसंग का
एक गीत और कहो प्रेम का, बसंत का

कोयल की कूक सी मीठी एक तान
छुपी छुपी, चंचल पर मादक मुस्कान
केसरिया रंग मिले सांझ के सुरूर
तितलियों से छुई-मुई मन के मयूर

प्यार मे सराबोर सांसों की त्रिष्न का
एक गीत और कहो प्रेम का, बसंत का

~ अशोक सिंह, न्यू यॉर्क  
    Mar 22, 2009

शनिवार, 12 जनवरी 2008

सुमति चैतन्य

ये कुछ पंक्तियां चिन्मयानंद आश्रम की प्रखर वक्ता ब्रम्ह्चा. सुमति चैतन्य की वाशिंटन डी. सी. की यात्रा के दौरान, उनके सम्मान में लिखी गयी थीं ।

ज्ञानशिखा चिर-ज्योति प्रज्जवलित,
ऊर्ध्व सारिणी, विश्व तारिणी।
सुमति, 'प्रचंड', प्रवाहित धारा,
दुर्गति नाशिनि, ब्रम्हचारिणी।

दें हमको आशीष पुण्यमयि,
बने ह्रुदय सद्सार-ग्राहणी।
देवी नमन तुम्हे है शत शत,
कथा उपनिषद, तेज धारिणी।

~ अशोक सिंह 
   न्यू यॉर्क 

शनिवार, 10 नवंबर 2007

प्रेम प्रतिबिम्ब


मेरा मन
जब भी विवेक के व्यथित तर्कों, एवं
मस्तिष्क के अनगिनत प्रश्नचिन्हों से
एक क्षण को भी
मुक्त होता हूं,
तुम इतनी सहजता से
स्वीकृतता - अस्वीकृतता के
द्वंद के मध्य
मेरी भावनाओं के केन्द्र बिन्दु का
स्थान ग्रहण कर लेती हो।

यूं ही बस,
पलक झपकते ही
सारे प्रकोष्ठ में
तुम्हरी चिर परिचित प्रेमगन्ध
एक बार और
भर जाती है।
सुवासित केशों की,
तुम्हारे देह की सम्मोहक सुगन्ध,
पुष्प सम कमनीयता मे मैं
आत्मलिप्त हो जाता हूं ।
और तुम,
उसी आकारहीन, वर्णहीन
सुरभित सुगन्ध की तरह
मेरी कल्पनाओं में चारों ओर
छा जाती हो,
मैं एक फ़ूल की पन्खुडी की तरह
स्वयं को
हल्का एवं शरीर रहित
मह्सूस करने लगता हूं,
तुम्हारे आत्मीय चुम्बनों का अहसास
रक्त अलकंतक कपोल
और, अपनी सीमायें
भुला देने को तत्पर
मेरा व्यक्तित्व.....
सबकुछ .....
पहले ही की तरह,
बिल्कुल पहले की तरह...।

- प्रेम प्रतिबिम्ब संकलन से

~ अशोक सिंह  
   न्यू यॉर्क, 11/10/07 

मंगलवार, 19 जून 2007

लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं


लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं ।
इसीलिये बिन मौसम बादल छायें हैं ॥

तिमिर बहुत गहरा है लेकिन,
जीवन भी उतना ही दुर्गम ।
रात्रि प्रहर कटते जाते हैं,
बोझिल पलकें गिनती क्षण-क्षण ॥

आंखों मे सपने कुछ-कुछ अलसायें हैं ।
लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं ।
इसीलिये बिन मौसम बादल छायें हैं ॥

पतझर की रुतु, कैसी ये रितु,
क्या बयार क्या पावस रुन-झुन ।
कोपल, किसलय, कोकिल किलकिल,
कल की बातें, कल के ये दिन ॥

कुछ बेमौसम फूल यहां मुसकायें हैं ।
लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं ।
इसीलिये बिन मौसम बादल छायें हैं ॥

जीवन कठिन दुखों की गागर,
शंशयमय पनघट की हलचल ।
जीवन डोर चलेगी जबतक,
कठिनाई पनपेंगी पल-पल ॥

खुशियं के ये अश्रु सहस भर आयें हैं ।
लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं ।
इसीलिये बिन मौसम बादल छायें हैं ॥

प्रेम-रहित नीरस जीवन यह,
किस पर मै न्योछावर करता ।
आस अभी तक लगी जहां पर,
ऊष्ण, शुष्क मरुस्थल मिलता ॥

मधुर मदिर के जाम कहीं छलकायें हैं ।
लगता मेरे गीत किसी ने गाये हैं ।
इसीलिये बिन मौसम बादल छायें हैं ॥

~ अशोक सिंह  
    न्यू यॉर्क, 6/19/07 

प्रेम निर्वाह

आज तुमने
हमारे मिलन की बेला को
हमारे परिणय के प्रहर को
झुठला कर
एक बार फ़िर से
मुझे असमन्जस मे डाल दिया....

एक युग से
तुम्हारे प्रखर एवं
परिपक्व प्रेम मे लिप्त
मैं इस अह्सास को
लगभग भूल ही चला था कि,
समय और दिशाओं की
असीमित पगडन्डियों पर,
अगड़ित दिशाओं में
मेरे मंडराते रहने के पश्चात ही
तुम मेरे जीवन में
स्थायित्व बन कर आईं थीं,
मैं अपने अंतर उर मे
उस मोहित-मॄगी को
कर्म, स्वधर्म,
निर्णय एवं दायित्व से
अपना चुका था.
तुम्हरे भी कटावदार नैनों मे, मैनें
महावर से भरे पैरों का
सपना संजोया हुआ देखा था
तुम भी, एक ज्वार-पल सी चुलबुल
फ़ाल्गुनी आकाश सी प्रफ़ुल्लित
मेरे उर-सागर मे,
संकुचित नदी सी
समा जाने को आतुर थी।

यह कलयुग ही, हमारा प्रेमयुग है
यूं कह
मिलने को आतुर,
अपने अंगों की आह्वान की ललक से
मुझ मे निहित पुरुष को
ललकारा था प्रिये,
मेरे अंतरमन एवं प्रेमी को
झकझोरा था,
उर्वषी सम यौवन से सराबोर
मेरी हर श्वांश मे
मेरे हर एक अवयव मे
नशीली सुगन्ध घोल देने वाली
अपनी उन्मादिता का सर्व-स्नेह
मुझ पर उड़ेलने को रत
मुझसे अन्गीकार का वास्ता करती
इस प्रणय की बेला के लिये
तुमने ही तो मुझे
तत्पर किया था।

ऒ देवपरी
मेरी अन्तरन्ग
मेरी अन्ततः लक्ष्य
मेरे गन्तय्व की सीमा
मेरे अस्तित्व का 'केवल' अर्थ,
हमारे इस मिलन से
तुम अपने पूर्ण नारीत्व एवं
मैं अपने पूर्ण पुरुषत्व का
भागी होता
तुम्हे अपने मे समेत कर
अपने मे निहित कर
एक भौतिक परन्तु
शुभ यथार्थ का
आरम्भ करता।

आज तुमने
इस मिलन की बेला पर
न आकर
उस तृषा की क्षुधा,
जो आग है
एक अमिट प्यास है, को
मेरे अन्दर जन्म दे दिया है
इस परिणय से हमारे प्रेम को
सम्पूर्णता मिल जाती।
लेकिन, सम्पूर्ण प्रेम की
इतिहास मे कोइ महत्ता तो है नही।
क्यों कि
राधा-कृष्ण का प्रेम तो आज भी अमर है,
कृष्ण-रुक्मिनी के प्रेम का
वर्णन भी तुमने कभी सुना है?
मैं तुम्हारे प्रेम के उन्माद मे,
तुम्हारी लालसा मे,
शायद इस तथ्य को
कभी समझ न पाता।

आज तुमने इस परिणय के प्रहर को
झुठला कर
अन्चाहे, अन्जाने मे ही
हुम दोनो पर
एक बड़ा उपकार किया है।
तुमने हमारे प्रेम को अमर कर दिया है......

~ अशोक सिंह  
    न्यू यॉर्क, 6/19/07  

शनिवार, 16 जून 2007

क्या राह में पलकें बिछाये तुम खड़ी हो?

सुलझी जीवन की पहेली, खोयी थी तुम वो कड़ी हो।
क्या राह में पलकें बिछाये तुम खड़ी हो?

निष्‍ठुरा है ये दुपहरी, धूप लगती पर भली सी,
तपिश रेगिस्तान के इस रेत में बस चुलबुली सी।
व्योम के अनुमान सारे अटकलों में रह गये हैं,
आज जिस परिधान में तुम सज रही हो सुंदरी सी॥

ज्यों बारिशों की चंद बूंदें, तप्‍त धरती पर पड़ी हों।
क्या राह में पलकें बिछाये तुम खड़ी हो?

लहर के उन्माद से जलधि अनिग्रह हो चला है,
पावसों की झड़ी से हर रोम चंचल हो चला है।
प्रकॄति की अनहोनियों भी जान कर अनजान बनतीं,
क्या नयन में काजल लगाते एक अश्रु बह चला है॥

ज्यों गहन मेघों बीच निकली, रश्मियों की कुछ लड़ी हों।
क्या राह में पलकें बिछाये तुम खड़ी हो?

भ्रमर भी बौराये हैं, कोपल, कली में भेद खोये,
आज उपवन भी खिले फूलों की सुन्दरता सजोये।
आम के बौरों की मदहोशी हवा मे घुल चुकी है,
क्या शर्म के आगोश मे छुप प्यार के कुछ बीज बोये?

ज्यों राह मे सत-रंगी, पुष्प मालायें पड़ीं हों।
क्या राह में पलकें बिछाये तुम खड़ी हो?

आज मै एकाकियों से निकल बाहर विचर सकता
मन की पीड़ा तज, अपरिमित प्रकॄति का उन्माद चखता
बोये थे जो बीज तुमने प्रेम के, वो लहलहाये
आज मे सौन्दर्य की भाषा हॄदय से समझ सकता

नयन अवलोकित करें छवि, सामने तुम हर घड़ी हो।
क्या राह में पलकें बिछाये तुम खड़ी हो?

सुलझी जीवन की पहेली, खोयी थी तुम वो कड़ी हो।
क्या राह में पलकें बिछाये तुम खड़ी हो?

~ अशोक सिंह  
    न्यू यॉर्क, 6/16/07  

इससे पहले कि शाम हो जाये


इससे पहले कि शाम हो जाये
वक्त यूं ही तमाम हो जाये
आओ कोई सपना संजो लें मिलकर
कल की खातिर मुकाम हो जाये

यूं तो उम्र बहुत लम्बी है, लेकिन
कुछ ही तो पल हैं ऐसे,
जिनमे हम अक्सर जीते हैं
कौन जी पाया है
हकीकत की संगीनी (दुष्कारी ) में
ख्वाब बुनने में या खयालों मे
अब तलक के ये दिन बीते हैं
कल के बारे मे भी जरा सोचो हमदम,
टूटे ख्वाबों के सहारे तो बसर हो सकती है
वरना सन्नाटे से भरी दोपहर की
सोच कर भी रूह मेरी कंपती है

यूं ही बस, ये वक्त और ये शाम गुजर जायेगी
कल दुबारा से नयी एक सुबह, फ़िर आयेगी
लेकिन मैं अपनी दुःश्वारी में और तू
अपनी मजबूरी में सिमट जायेगी
हम साथ नहीं होंगे फिर, न सही
फिर इन अध-पके ख्वाबों की याद आयेगी
आज तुम संग हो तो ये नींव डाल देते हैं
साथ किस्मत रही तो इमारत भी ये बन जायेगी
कौन जाने कल कौन सी करवट बैठे
इन हसीं खयालों में कुछ उम्र गुजर जायेगी
न जाने मेरी ही उम्र की रफ़्तार क्यों ऐसी है
मेरे तो बस की नही, तुम होगी तो सम्हल जायेगी

इससे पहले कि शाम हो जाये
वक्त यूं ही तमाम हो जाये
आओ कोई सपना संजो लें मिलकर
कल की खातिर मुकाम हो जाये

~ अशोक सिंह  
    न्यू यॉर्क, 6/19/07  

सोमवार, 19 फ़रवरी 2007

मोड़

ये ज़िंदगी भी अज़ीब है,

जब से होश सम्हाला है
न जाने कितने, तिराहे चौराहे
आ चुके हैं ।

अब फिर से
एक नया मोड़ देने की कोशिश
जारी है,
इस ज़िंदगी को ।

मै अकेला रहता हूं
क्यों कि,
मेरे तमाम सारे पहलुओं को
को कोई एक साथ
समझ नही सका है,

कहीं उम्मीद लगाई है,
लेकिन डर है,
वहां जा कर
अपना अस्तित्व ही
न खो बैठूं ।

~ अशोक सिंह  
    न्यू यॉर्क, 2/19/07