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शनिवार, 29 नवंबर 2014

गीत - अपनी धुन में रह प्यारे






अपनी धुन में रह प्यारे
पर जग भी मत तज प्यारे।।   

अपनी धुन में रह प्यारे
पर जग को मत तज प्यारे
जग से न बेगाना बन  
खुद से न अनजाना बन
ताल-मेल ऐसा कुछ कर
मन भी, बाहर रहे विचर  
दो मन मिले बने दुनिया
फिर है सुख या दुख है क्या
         चलता है, तो चलता जा
         रख मन के मीत सँवारे।
         अपनी धुन में रह प्यारे ।।
         पर जग भी मत तज प्यारे।।   

मन साधे तो मानस है
तब ही बसते मन रस है
रिद्धि-सिद्धि साधना सभी  
एकाग्रित मन ही बस है
इससे जो बाहर निकले 
फिर चाहे जितना कर ले
जब तक ठोकर न खाये
ठौर ठिकाने कब आए
         सब जाने फिर भी भटकें  
         रह तू अपनी हद प्यारे।
         अपनी धुन में रह प्यारे
         पर जग भी मत तज प्यारे।।   

अपना जप तू जपता जा
दुनिया को भी रमता जा
खुद को पाती कौन लिखे,
खुद से, जग से मिलता जा
खुद के दुख क्यूंकर तू गिन
बाहर देख कष्ट अन-गिन
इक का भी यदि क्लेश मिटा
समझ ये जीवन भेद लुटा
         अंतः से भर शक्ति, संवर
         कर जीवन सार्थक प्यारे। 
         अपनी धुन में रह प्यारे।।
          पर जग भी मत तज प्यारे।।    


ब्रह्म महा जीवन क्षण-भर
पर जीवन-पल है अक्षुण्ण
ज्योत जले जब मिल जुल कर
दैविक तेज, न हो नश्वर
बन कर सबका मीत, सखा
कान्हा बन, तू रास रचा
आना जाना ध्यान न रख
अपनी भी पहचान न रख
          बन जा कुम्भ, कभी जल में
          या बन जलधि कभी प्यारे।
          अपनी धुन में रह प्यारे।।
          पर जग भी मत तज प्यारे।।   

प्रेम त्याग की दुनिया में
मन भावों की कुटिया में
तुझको यदि है प्रेम मिला
समझ विधाता है इसमें
सह ले जग के स्वांग सभी
दुख और दर्द के मांग सभी
प्यार मिला जो जीवन में
रख उसको शाश्वत मन में
          डर मत सब पा जाएगा
          जब डुबकी प्रेम भँवर मारे
          अपनी धुन में रह प्यारे।
          पर जग भी मत तज प्यारे।।   

खुशियों की ले सौगातें
सबके प्रेम की ले बातें
हो जा बस दीवाना तू
ले जग के दिन और रातें
प्रिय के दिल में प्रीत जगा
दीवानों सी रीत लगा
मन-सुख तो दुनिया न्यारी
दुख में भी लगती प्यारी
          जिसका है, उसका हो जा
          फिर उसके रंग में रंग प्यारे।
          अपनी धुन में रह प्यारे।।
          पर जग भी मत तज प्यारे।।   

~ अशोक सिंह
   न्यू यॉर्क, नवं॰ 2104                 

सोमवार, 3 नवंबर 2014

मुक्तक - जब हवा संवेदनाओं संग

जब हवा संवेदनाओं संग हमें आगोश ले ले
तैरते आँखें खुली रख गगन-तक-अट्टालिकायेँ
नहीं सीखा ठोकरों में कभी भी रखना ज़माना
पर यहाँ तक आ गए हैं, प्रेम के प्रतिमान ले।

~ अशोक सिंह
   Nov. 2014, New York

गीत - इसलिए ही, मैं नशे में हूँ।




इसलिए ही,
मैं नशे में हूँ।

जब जगत में सर्वपरि हो
मनुज के प्रतिकूल रेले
ट रहा हो प्रेम हर दिन
बढ़ रहे सतही झमेले
मन स्वयं पर कर रहा हो
विवश, बारंबार अंकुश  
विमुख कब हो सकूँ इनसे
जब इसी संसार में हूँ ।
इसलिए ही,
मैं नशे में हूँ।

प्रेम की भी डगर पर चल
दुखों की ही खेप झेली
कौन वो इंसान जिसको
बूझूँ, है ऐसी पहेली
मित्र, अग्रज, अनुज या रब
सभी की पहचान ले ली
स्वजन की माया घिरा
पर स्वयं पर ही भार मैं हूं,
इसलिए ही,
मैं नशे में हूँ।

मोड लूँ कर्तव्य से मुख
हुआ संभव नहीं अब तक
हर कसम गाँडीव की जैसे
दिलायी सखे ने रख
जगत के कुरुक्षेत्र में अब
विजय की अभिलाषा नहीं है
पार्थ बन कर जीऊँ क्यूँ कर
कृष्ण का कोई न मैं हूँ,
इसलिए ही,
मैं नशे में हूँ।

~ अशोक सिंह
  अक्टूबर 2014, न्यू यॉर्क  

गीत - मन मीत बनो, तो चैन आए




मन मीत बनो, तो चैन आए

कुछ दर्द बढ़ा कुछ पीर बढ़ी
मन में धुंधली तस्वीर गढ़ी
कुछ दर्द के बेल और बूटों से
दिल नें दुखती तस्वीर मढ़ी
ये सच्चे दर्द या झूठे हैं
पर मन को लगे अनूठे हैं
कोई झूठ तसल्ली दे जाये
मन को कोई ढाढ़स दे जाये
मन में रहते, तो चुभते हैं
जाने अंजाने उगते हैं
कोई सीख सिखाओ, धीर धरो
इस भटके पर भी करम करो  
मन को भी कुछ आराम आये  
मन मीत बनो, तो चैन आए

आँसू की भाषा, सब मानें
कोई मन की पीर को भी जाने
जब दुखती टीसें दबी रहें
मन की आँखें डब-डबी रहें
बाहर मुस्कानों का बाना
कोई कितना ओढ़े, या माने
दुख की आँचल जब तर जाये
आँसू बह निकलें, न माने
कोई मन के भीतर झांक भी लो
क्या दुखता है कोई भाँप भी लो 
जब मन खुश तो दुनिया गद-गद
है सच ये ही, कोई जांच भी लो
कोई पीर पराई, समझ, हरो
हमसे भी थोड़ा धीर धरो
दुखियों के भी कोई काम आए
मन मीत बनो, तो चैन आए

माना सुख की ही आशा में
दो पल की प्रेम अभिलाषा में
भोला मन है, भरमाता है
भर प्रेम पींग, शरमाता है
पर ढाई आखर प्रेम भला
कब ढाई दिन से अधिक चला
दो क्षण की भावुक आशा में
जीवन भर लिया निराशा में
फिर इल्जामों से कोई भिड़ा
जीते जी मर कर कोई लड़ा
अब पीर नहीं, कोई चाह नहीं
जब आगे कोई दिखती राह नहीं
कोई उंगली थामो, गले लगो
कोई बनो रोशनी, आस जगो
भटकों को कुछ आराम आए
मन मीत बनो तो चैन आए।   

~ अशोक सिंह
  सितंबर 2014, न्यू यॉर्क