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सोमवार, 3 नवंबर 2014

गीत - वो हिंदी है

http://mondaymorning.nitrkl.ac.in/archives/archives/images/stories/17092012/featured.jpg



जन-मन जिव्ह्य विराजे
भारत भाषण हिंदी है

हो मन-पूर्ति जिसे पढकर
है हिंद भाषाओं की सहचर

जो जुड़ती मर्म से कोमल
वो मन का ध्यान हिंदी है।

ये बच्चन की है अलमस्ती,
ये दिनकर की है रसवन्ती
जो गहरी भी है और सादी
भाष्य विज्ञान हिंदी है।

निकलती दिल से हिन्दी है
'क्या बात है' से हिन्दी है
जगत-मन मेल करवाती
स्रोत अविराम, हिन्दी है 


~ अशोक सिंह, न्यू यॉर्क,
   नवंबर 12, 2014 

गीत - चलो एक कप चाय हो जाए



मिल बैठे सब, क्यों हैं गुमसुम
चलो एक कप चाय हो जाए

बैठे हैं तरंग के तट पर
गीत छंद के भावों बह कर
जीवन में ऐसे भी क्षण आते
मिलते सब दुविधायें तज कर
आज दुपहरी सजी हुया हुई है
लेना देना सब कुछ मिल कर
चुस्की कविता की हो या फिर
कुछ प्रसंग की बात हो जाये
चलो एक कप चाय हो जाए

मन के सुंदर सब हैं मोहक,
साथ मिले तो मिले मनोरथ
दुख का क्या, है आता जाता
सुख तो अक्सर आँख मिचाता 

भाँप सके हैं कब जीवन में
मीठा तीखा कब क्या आता,
छोड़ो इसे, पकौड़ी मिर्ची -
‘चुस्की’ गरम साथ हो जाये
चलो एक कप चाय हो जाए

हमने भी तो ऐसी ठानी
बोलेंगे बस मीठी बानी
बिन्दु, व्यास, पुर्णिमा या फिर
संजू, मीना, धरम ज़ुबानी
कमी नहीं सुंदर लोगों की
किस किस की है बात सुनानी
दूर दूर से लोग आए हैं
खान-पान संग बात हो जाये
चलो एक कप चाय हो जाए

~ अशोक सिंह

  Sep, 2014. new York.

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

हर प्यार को सलाम


ज़िक्र करना एक का क्या, लूँ सभी के नाम
या भेज दूँ खुशबू भरे, हर प्यार को सलाम!

~ अशोक सिंह
   Feb. 2014, New York

हर दिल से मोहब्बत का जज़्बा है


हर दिल से मोहब्बत का जज़्बा है, तो हूँ 
शायर हूँ, किसी एक की जागीर नहीं हूँ,

आईने में नहीं मुझको ज़ुल्फों में लगाओ,
हूँ प्रेम का गुलाब, कोई तस्वीर नहीं हूँ

तकिये में गिरे आंसुओं से मेरा क्या सबब
पल भर का हंसीं ख्वाब हूँ, कोई पीर नहीं हूँ

जो वक़्त से न ढल सके, वो इश्क़ की तहरीर
सदियों की घिसी पिटी कोई लकीर नहीं हूँ

मिल जाये एक बार तो नेमत है ख़ुदा की  

हूँ इश्क़, लगे जो दिल पे कोई तीर नहीं हूँ 
 

~ अशोक सिंह, 
    न्यू यॉर्क  

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

गीत - जो प्रतीत हो कब होता है।

जो प्रतीत हो कब होता है।

सबको मिलती दृष्टि एक कब
रहती सबसे सृष्टि एक कब 
कुछ पा सब, बाकी बस-कुछ, कुछ का जीवन बस रोता है ।
जो प्रतीत हो कब होता है।

सपने निष्छल मानस मन के
सच होते, कब कितने जन के
एक सत्य से जीवन सार्थक, फिर क्यों मन सपने बोता है ।
जो प्रतीत हो कब होता है।

जीवन सच या केवल भ्रम है
निर्विकार का बस अनुक्रम है
मृग-मरीचिका में संभ्रमित, जग को मानस क्यों ढोता है।
जो प्रतीत हो कब होता है।

भटकी हुयी ज्यों नाव हो,
संग भ्रमित अंतर्भाव हो,
हर सांस की दे कर दुहाई, सच के मग में क्यों रोता है।
जो प्रतीत हो कब होता है।

गीत - याद फिर तुम बहुत आए ।

याद फिर तुम बहुत आए ।
उषा पट पर जब सुनहरी, किरण ने सपने दिखाये ।
याद फिर तुम बहुत आए ॥

जब पड़ीं पावस फुहारें
मीत की मनहर गुहारें
सजल तन को तापती
विजन की ठंढी पुकारें
उस घड़ी में सजन तुम बिन, आस भी कैसे लगाए ।
याद फिर तुम बहुत आए ॥

पवन सायं, नील अंबर
चले सब उपवन डगर पर 
फूल पत्ते भ्रमर तितली
थके हारे गुनगुना कर
पर अपरिमित चाह मेरी, मिलन की अग्नि जलाए ।
याद फिर तुम बहुत आए ॥

रात शीतल चाँदनी की
गीत की भी रागिनी की
चाँद तारे मिल-मिला कर
अग्नि जलवाते विरह की
जब अलगनी में कोई तारा, भोर का घूँघट उठाए ।
याद फिर तुम बहुत आए ॥

गीत - तुम कहो तो मान लूँ मैं

तुम कहो तो मान लूँ मैं
गीत की हर रागिनी के, शब्द सारे जान लूँ मैं ।
तुम कहो तो मान लूँ मैं ।।

तुम कहो तो याद के पल
आज या, गुज़रे हुये कल
एक माला में पिरो कर
हँसीं, वो उन्माद के पल
ज़िंदगी को, उस खुमारी से नया अंजाम दूँ मैं ।
तुम कहो तो मान लूँ मैं ।।

रही सारी शर्त, सब मंजूर
नहीं जाना कभी हमसे दूर
तुम बनो चंदा गगन में
तो निहारूँ बन चकोर
दूरियाँ हैं, क्या गगन से हाथ तेरा मांग लूँ मैं ।
तुम कहो तो मान लूँ मैं ।।

सौम्य तन की धूप तेरी
शांत मन की छांव तेरी
इंद्र को मदहोश कर दे
हृदय बसती गंध तेरी
इस समर्पण की घड़ी में, प्रेम-रस का पान लूँ मैं ।
तुम कहो तो मान लूँ मैं ।।

गीत - कहूँ दिल की बात किस कर !

कहूँ दिल की बात किस कर !

मैं रहूँ चुप सिवा उसके हर किसी से
मौन रह कर भी करूँ विनती उसी से
विवश असमंजस रहूँ जब भी अकेला
प्राण उसके बसे उर, मैं हूँ उसी से ।

पर अलग कैसे रहूँ, उससे बिछड़ कर,
कहूँ दिल की बात किस कर !

जानने से पूर्व मुझको चाहती थी
गंध मिस्री सांस मेरी जानती थी
फिजाँ मेरी इत्र से उसके महकती
मुझे मुझसे खूब वो पहचानती थी

साथ जन्मों जन्म का, फिर क्या स्वयंवर,
कहूँ दिल की बात किस कर !

नयन मेरे आसना में हैं उसी के
हृदय के आवेग में झरने उसी के
मरुस्थल सा हींन था सूखा सरोवर 
आज उत्पल खिले तो सपने उसी के

चाह और अनुरक्ति में, उसकी जाऊंगा संवर,
कहूँ दिल की बात किस कर !

रविवार, 8 दिसंबर 2013

गीत - स्वागतम

स्वागतम, स्वागतम, स्वागतम...!
हम सभी के हृदय से सहश्रों नमन,

सुशीलम, वंदनम, स्वागतम...!
स्वागतम, स्वागतम, स्वागतम...!!

फूल इठलाये, इतरायी हैं तितलियाँ
खग उड़ें पंक्ति में, गायें रागिनियाँ
मन प्रफुल्लित बिखेरे हुये हैं सुमन

सुशीलम, प्रियम, स्वागतम...!
स्वागतम, स्वागतम, स्वागतम...!!

संध्य की भी अजब आज है लालिमा
चन्द्र देखे कनखियों से, बांधे समा
आज सुमधुर लगे वाद्य की हर तरंग

सुशीलम, विनीतम, प्रियम...!
स्वागतम स्वागतम स्वागतम...!!

कौन आता किसी के लिए कब-कदा 
आए हो, अब रहोगे हृदय ही सदा
जीते मन, इसलिए आज अर्पित नयन

सुशीलम, देवी मम, पूजितम् ...!
स्वागतम स्वागतम स्वागतम...!!

~ अशोक सिंह
   न्यू यॉर्क, दिसंबर 8, 2013

शनिवार, 30 नवंबर 2013

गीत - द्वार बजेगी शहनाई


निश्छल सपनों की चुन कलियाँ, मधुरिम बेला आई
प्रभु कृपा, स्नेह स्वजन से, द्वार बजेगी शहनाई ।

तन-मन दोनों ही उत्सुक, आशीष आपका पाने को
स्वागत नयन बिछे हैं आओ, घर गूजेंगी शहनाई ।

देव देवता भी हर्षित हो, हम पर आशिर्वृष्टि करें,
अनुनय मिलन हमारे घर में, मन गूँजेगी शहनाई ।

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

मुक्तक - बापू


2nd October, 2013
गांधी जयंती के अवसर पर,
बापू की स्मृति में:

लाठी, चश्मा, धोती चप्पल, उस पर दुबली काया
लेकिन यदि व्यक्तित्व देख लो उसमे देश समाया
बापू का सच, पीर पराई, सीख हमेशा करना याद
रखना देश सभी से पहले आए स्वार्थ सभी के बाद । 

~ अशोक सिंह, 
   Oct, 2, 2013