Disable Copy Content

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

कवि कल्पना की पराकाष्ठा

राह ये जाती कहाँ, हमको कहाँ भरमा रहे,
भले पूछा आप ने, तो सुनो हम फरमा रहे ।
बादलों तक हो लपकती, धरा की आकांक्षाएँ,
हम रहें प्रत्यक्ष, पर मन सूर्य और चंदा रहे ।

~ अशोक सिंह  
   न्यू यॉर्क 

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

राह अभी भी तकना होगा !

स्वर्णिम सूरज गगन चढ़ चुका,
दिन का रास्ता और बढ़ चुका,
कल का कल से, और आज से यूं ही नाता रखना होगा ।
राह अभी भी तकना होगा !

दिन आते जाते, सृष्टि की माया
सुख कुछ, कुछ लाये दुख की छाया
सभी दिवस पर प्रश्न-चिन्ह है, सही दिवस कब चुनना होगा ।
राह अभी भी तकना होगा !

मौसम आए, आएंगे अविरलता से
समय चक्र गतिमान, अविरतता से
कितने मौसम की साझी, इस क्षणिक दूत से करना होगा ।
राह अभी भी तकना होगा !

क्या एक जन्म ही काफी है, पूछे मन
या एक सांस मे जी डालें सारे जीवन
तन का मन से, मन का मन से जीवन परिचय करना होगा
राह अभी भी तकना होगा !

मेरी कब मुझसे ही होगी पहचान
कितने बरस, परंतु मैं खुद से अंजान
सदियों की इस ऊहापोह में, खुद को कब तक तकना होगा ।
राह अभी भी तकना होगा !

ऐसा भी दिन आए जब मैं बुद्ध बनूँ
निर्बलता के बाने से हट, शुद्ध बनूँ
सदियों मे यदि एक बुद्ध तो, कितनी सदी ठहरना होगा ?
राह अभी भी तकना होगा !

~ अशोक सिंह  
   न्यू यॉर्क 

आज अनमना सा है दिल कुछ...!

तुमने घर के आँगन मे कब बोया पेड़ गुलाबों का
घर की चारदीवारी मे अब फूल खिलेगा कांटो का

कौन आग से खेल रहे हो, कौन से ग़म का मातम है
क्या से क्या देखो कर डाला अपने सबके सपनों का

अभिनय वो फनकारी है वज़न बात मे रख देती है,
केवल बोले सच तो करता कौन भरोसा अपनों का ।

ऐसी भी मजबूरी के दिन देख चुके फाका-मस्ती में
पड़ी उठानी चीजें वो भी, जिन पर हक़ था सच्चों का ।

जब जब बात करी है तुमने, बस शिकवों की बात करी,
आज अनमना सा है दिल कुछ, जिक्र करो बस बच्चों का ।

~ अशोक सिंह  
  न्यू यॉर्क 

रविवार, 20 नवंबर 2011

सूरज पे रोशनी !

अगर चाँद पर चाँदनी नहीं है होती,
तो क्या सूरज पे भी रोशनी नहीं होती

मेरे घर के किवाड़ खुद ही खुल जाते हैं,
उनके आने मे कोई आहट भी नहीं होती

रेत तो रेत है, निकल जाएगी पैरो के तले,
कोसते रेत को, जिसकी नीयत है यही होती

रेत पर नाम लिखा और वो बह भी गया
लौ मे जलने वालों की कोई उम्र नहीं होती

कभी मिलना फुर्सत मे तो बताएँगे हम भी
चाहत मे हमारी दर-ओ-दीवार नहीं होती।

~ अशोक सिंह  
   न्यू यॉर्क 

मुक्तक - ७/१३/११ मुम्बई बम ब्लास्ट

जो घायल हुये हादसे में इक आस ढूँढने निकले थे
रोज़ी रोटी की चिंता में, मम्मी और पापा निकले थे
सपने कल के ले आँखों मे थे हिन्दू मुस्लिम ईसाई
क्या पता उन्हें, खूंखार दरिंदे मौत बांटने निकले थे ।

~ अशोक सिंह
  न्यू यॉर्क, 2013

रविवार, 14 नवंबर 2010

सब-कुछ कुछ बदला सा है !

समय के फेर में क्या कुछ नहीं बदलता है, वियोग मे बदलाव कुछ ज्यादा ही मन कॊ चुभते हैं । ऐसे में अगर वो मिल जायें जिनसे सारे गिले-शिकवे किये जा सकें तो, जैसे आग मे घी काम करती है वैसे ही मन के गुबार निकलने शुरू हो जाते हैं.....!

कितने अरसे बाद मिले हो,
मन से बाहर तुम निकले हो
कितने सावन, पतझर, मौसम, सब बेमानी बीता सा है !
सब-कुछ कुछ बदला सा है !

मैं ऊपर से इंसान वही,
चेहरा वो, मुस्कान वही,
पर अंतर्मन की दबी कूक में, दर्द तुम्हारे जैसा है !
सब-कुछ कुछ बदला सा है !

रात्रि प्रहर की बात न छेड़ो
या दिन की सौगात न छेड़ो
रातों क्या अब दिन में भी, जीना मुश्किल सा है !
सब-कुछ कुछ बदला सा है !

भरी दोपहर श्राप बन गयी
दिनचर्या संताप बन गयी
सुबह शाम की उलझन में, सब कुछ उलझा सा है !
सब-कुछ कुछ बदला सा है !

माया मोह छोड़ न पाया
तुमसे भी मुख मोड़ न पाया
मरते जीते सोते जगते, देखा इक सपना सा है !
सब-कुछ कुछ बदला सा है !

जीया फिर मैं किस उमंग में
कटता जीवन किस तरंग में
अपने में कुछ ढूंढ़ सका न, जो भी चाहा तुम सा है!
सब-कुछ कुछ बदला सा है !

बदला अंदर का इंसान,
तुमसे थी जिसकी पहचान,
जो तुमने देखा जाना, क्या अब भी वो वैसा है !
सब-कुछ कुछ बदला सा है ?

मौसम बदले इससे पहले,
कदम डगमगे इससे पहले,
सम्हला गिर कर पहले पर, अब उठना मुश्किल सा है !
सब-कुछ कुछ बदला सा है !

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

मान भी जाओ, जाने भी दो !

मान भी जाओ, जाने भी दो !

कब जाने फ़िर ये वक्त लौट कर आयेगा,
कब जाने फिर मनुहार कौन करवायेगा,
पल बीत न जाये इसका ही है डर मुझको,
कल क्या जाने दिन कौन अजूबा लायेगा !

मन जो आता, आने भी दो !
पर, मान भी जाओ, जाने भी दो !

दिन आते जाते, लाते यादों की झांकी,
तुम रहे कभी या मै ही भटका एकाकी,
अब बदली से है चांद निकलने को आया
कह दो मन की, कुछ रह जाये न बाकी !

मन चंचल है, भरमाने भी दो !
यूं, मान भी जाओ, जाने भी दो !

इनकी उनकी बातें सुनने मे है क्या रस,
निर्लिप्त भाव से लेती है दुनिया सब रस,
जो खोया पाया, हार जीत वो अपनी थी,
न्योछावर हो, अपना भी लो तुम मुझको बस !

गीत प्रणय का, गाने भी दो !
और, मान भी जाओ, जाने भी दो !

तुमने सदैव मुझसे मांगी छोटी खुशियां,
दे न सका चाही मैने जो सुख लणियां,
पर आज समय का उग्र चक्र झकझोर रहा,
जुड़ जाने दो हम दोनो की सतरंगी कड़ियां !

मीत मिले, मन तन मिल जाने भी दो !
अब, मान भी जाओ, जाने भी दो !

शनिवार, 6 मार्च 2010

मेरा भारत महान - एक और नजर....


'अनेकता मे एकता' के गूंजते हर तरफ़ गान
सर उठे सबका हमारा, गर्व से हो यही भान ।
गीत सतरंगी, हमारे ग़ालिब और टैगोर के,
एक भारत है हमारा, एक ही सबका है मान ॥

आज है कमजोरियां, हममें बहुत माना सही
कल की पीढ़ी से मिला जो बस वही माना सही ।
वो भी मारे थे बेचारे नोन लकड़ी तेल के,
हम कहें कैसे कि उनकी सोच ऐसी क्यों रही ॥

बदलती हैं रीत सारी, आज कल या लगे परसों
जड़ें इनकी अगर गहरी, कभी लगते शायद बरसों ।
मन का लालच, घृणा तृष्ना और भी होती प्रबल,
आधी जनता भूख से हर रात न जब पाये सो ॥

हम भी तो अब आ खड़े उस अहं जीवन मोड़ पर
एक पीढ़ी खड़ी आगे युव-अवस्था छोर पर ।
मार्ग दर्शन हम करें या माप दंड बना के दें,
एक मौका मिला हमको, चल न देना छोड़ कर ॥

एक से ही शुरु होता कोई अच्छा चलन, काम
मिल सवांरे युवा ताकत, मार्गदर्शन दे के मान ।
प्रगति हम ने करी है पर जूझ कर संघर्ष कर,
आने वालों के बना दें रास्ते सुखमय, आसान ।।

मत न देना ढील इस उन्माद में, उत्सर्ग में
राह थी ये कठिन, धुंधलापन अभी भी क्षितिज में
पर, आ खड़ा भारत हमारा अग्रजों की पंक्ति में
शीघ्र ही फ़िर कह सकोगे ’है मेरा भारत महान’ ।
शीघ्र ही फ़िर कह सकोगे ’है मेरा भारत महान’

जय हिंद



~ अशोक सिंह  
   न्यू यॉर्क 
 

सुंदर नारी


मैने बस इतना ही बोला, अतिसुंदर सच में नारि हो तुम,
कवि कल्पना फ़िसल जाये, वो सृष्टि का श्रंगार हो तुम ।
छवि उत्तम है, तन मोहक है, मन भी कुछ सुंदर यदि होता,
ऐसा क्या कह डाला मैने, इसमे भी कोई है रोता ???

~ अशोक सिंह  
  न्यू यॉर्क 

लौट चलें...?

क्य़ा करोगी लौट कर, क्या रखा उस पार मे
कौन है जो राह जोये, दूर उस संसार में
कोटि लहरें कोटी सांसें गुजरी हैं उस प्रहर से
हाथ तुमने जब दिया था अपना, मेरे हाथ में ।


प्यार कोई रितु नही, जो घूम, आये हर बरस
प्यार वो उपवन नहीं, खिले ऎक ही बार बस
ये तो वो वरदान है जो बिखरे अद्भुत रंगों में
स्वाद इसके सदा बदलें, ढूंढते क्यॊं एक रस ।


दर्द हमने सहे मिलकर, कभी ज्यादा कभी कम
गिले शिकवे किये सारे, कभी मै या कभी तुम
रीत कैसी ये निकाली, प्यार का इज़हार कैसा
भला कैसी ये मोहब्बत जिसमे आये मैं या तुम ।


ये सिला भी देख लेंगें, दौर एक दिन गुजरेगा
कल का होगा वो ज़माना, आज तो न रहेगा
जीत जाओ आज फिर से, ये मेरी बाज़ी  नहीं
पर नाम मेरा और तुम्हारा साथ शाश्वत रहेगा ।

~ अशोक सिंह 
   न्यू यॉर्क 

फ़िर बसंत आयें जीवन में...!

फ़िर बसंत आयें जीवन में...!

सहमा सहमा जीवन पथ, कुछ अंधियारे उजियारे हैं
कुछ धुंधली धुंधली भोरें, कुछ शामों के अंधियारे हैं
कुछ सांसे लेती बस्ती हैं, कुछ मस्ती कुछ सुस्ती में
जीवन नैया है डोल रही, मंझधार कहीं या किनारे हैं ।

ये मरुःथल सा सूखा जीवन, कब बदलेगा सावन में
फ़िर बसंत आयें जीवन में...!

उपवन में किसलय आतुर हैं, फिर से खुल मुस्काने को
कलिका भी कल इतरायेगी, दिन दूर नहीं वो आने को
रितु आती है रितु जाती है धरती हंसती, मनुहारती है
पर हम एकाकी, तरस रहे, भंवरें का गुंजन गाने को ।

सुन्दरता सुन्दर लगती, हो ऎसा मन की बगियन में
फ़िर बसंत आयें जीवन में...!

मन प्रबुद्ध, है सब सुविधायें, क्या है ऐसा जो नहीं मिला
सुंदर आंगन, सुन्दर बगिया है कौन पुष्प जो नहीं खिला
भौतिक सुख से तन सराबोर पर, मन बंजर धरती सा है
ग्यानी ध्यानी सब हम में ही, पाता पर कोई नहीं सिला ।

प्यारी दुनिया छोटी छोटी, बांटो सब, मन-आंगन में
फ़िर बसंत आयें जीवन में...!

ठहरो भाई, कुछ सोचो, हम तुम से ही सब आया है
हम में तुम में ही नहीं बनी, ये कैसा खेल रचाया है
कैसी विडंबना, पागलपन जिसको हमने जितना चाहा
ईश्वर साक्षी उनका मेरा, उसको उतना ही रुलाया है ।

बांटो खुशबू सबसे, मुझसे, अनगिनतन फूल दो खिलने
फ़िर बसंत आयें जीवन में...!

बुधवार, 19 अगस्त 2009

बात गौर से विचारिये

बात से ही बात बने बात को संवारिये
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

बात आयी गयी ठहरी या बवाल बन गयी
बात जब चली तो तीर से कमां निकल गयी
बात बात मे ही कभी बात भी है बन गयी
बात जब नहीं बने तो बात को सम्हालिये ।
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

बात से ही तू तू मैं मैं की जबान, बोलती
दुश्मनी की दास्तानें बात से रुख मोड़तीं
बात जब बिगड़ने लगे,मेरी बात मान कर
ठहरिये और ठिठकिये माहौल आजमायिये ।
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

बात मे है बहुत गुन बात अगर तोलिये
सोच समझ और विचार कर के अगर बोलिये
बात से ही मित्र बनें, प्यार औ दुलार मिले
बात चीत कीजिये और दिलों को सजायिये ।
बात ये पते की, बात गौर से विचारिये ।

~ अशोक सिंह

शनिवार, 18 जुलाई 2009

हूं मैं कौन ?



क्षण भंगुर पंजर के वाहक,
भ्रम में अब तक जीते आये ।
अविरल जीवन के सब ग्राहक,
मन से मन को हरते आये ।

सहज पवन मे डग-मग,मद्धिम
सुखमय नौका चलती रहती ।
अल्प दुखों की चुभन कदाचित
आती रहती, जाती रहती॥

बीती कितनी रुतु बसंत की
बीते कितने सुखमय साल ।
सात सुखों के इस समुद्र में
इक दिन टुटा भ्रम का जाल ।

ज्ञ्यान शिखा मे प्राण पनपते,
ही सवाल उठते कुछ मौन ।
अह वयं की उहा-पोह मे,
पूछा आखिर हूं मै कौन ?

सहज रूप से श्रंग विराजित
कर्मठता की मैं उपमा ।
सांसारिक या अहं ब्रंह हो
सब देखा, समझा अपना ।

पर कल क्या था,सोच न पाया
कौन था मैं या फिर "क्यों" हूं ।
सहज प्रतिष्ठित कर बैठा था
बरबस मैं दिखता ज्यों हूं ।

सतत रहा है "मैं" संबोधन
बाल, युवा या वृद्ध-आश्रम ।
"कौन"जुड़ा जब पृश्न कोंचता
साथ युगल का होता दुर्गम |
असमंजस मे अंतर्मन की
तह मे जा कर ली डुबकी ।
नया एक व्यक्तित्व ढूंढता
जिसमे अविरलता बसती ।

परिभाषायें बदलेंगी, ज्यों ज्यों
जीवन पथ पर कदम चलेंगे ।
आज सबल, सक्षम शरीर तो
अर्थ - सिद्धि का रंग भरेंगे ।

प्रश्न यही है, यही रहेंगे
समय न बदले इनकी रीति |
आज सरल, जो सार्थक लगती
कल जाने कैसी हो प्रीति ।

कल की जर्जर काया मे
क्या गूंजेगा उत्तर का मौन ?
उम्र का सूरज ढलते ढलते
पहचानेगा आज का "कौन" ?

~ अशोक सिंह
   न्यू यॉर्क 

रविवार, 22 मार्च 2009

एक गीत और कहो प्रेम का.....|


एक गीत और कहो प्रेम का, बसंत का

सांझ की बयार में, बौरों की खुमारी
सुरमई लाली, उड़ते खगों की कतारें
थके हुये पुष्पों की बिखरी सुगंध
अलसायी आंखों की जगती उमंग

पास आओ तान छेड़ो प्रीत के प्रसंग का
एक गीत और कहो प्रेम का, बसंत का

कोयल की कूक सी मीठी एक तान
छुपी छुपी, चंचल पर मादक मुस्कान
केसरिया रंग मिले सांझ के सुरूर
तितलियों से छुई-मुई मन के मयूर

प्यार मे सराबोर सांसों की त्रिष्न का
एक गीत और कहो प्रेम का, बसंत का

~ अशोक सिंह, न्यू यॉर्क  
    Mar 22, 2009

शनिवार, 12 जनवरी 2008

सुमति चैतन्य

ये कुछ पंक्तियां चिन्मयानंद आश्रम की प्रखर वक्ता ब्रम्ह्चा. सुमति चैतन्य की वाशिंटन डी. सी. की यात्रा के दौरान, उनके सम्मान में लिखी गयी थीं ।

ज्ञानशिखा चिर-ज्योति प्रज्जवलित,
ऊर्ध्व सारिणी, विश्व तारिणी।
सुमति, 'प्रचंड', प्रवाहित धारा,
दुर्गति नाशिनि, ब्रम्हचारिणी।

दें हमको आशीष पुण्यमयि,
बने ह्रुदय सद्सार-ग्राहणी।
देवी नमन तुम्हे है शत शत,
कथा उपनिषद, तेज धारिणी।

~ अशोक सिंह 
   न्यू यॉर्क